रविवार, सितंबर 28, 2008

गुरु चरनन में ध्यान लगाऊं

गुरु चरनन में ध्यान लगाऊं।
ऐसी सुमति हमे दो दाता ॥


मैं अधमाधम पतित पुरातन।
किस विधि भव सागर तर पाऊं ।

ऐसी दृष्टि हमें दो दाता।
खेवन हार गुरु को पाऊं ॥

गुरु चरनन में ...


गुरुपद नख की दिव्य ज्योति से।
निज अन्तर का तिमिर मिटाऊं ।

गुरुपद पदम पराग कणों से।
अपना मन निर्मल कर पाऊं ॥

गुरु चरनन में ...


शंखनाद सुन जीवन रन का
धर्म युद्ध में मैं लग जाऊं ।

गुरुपद रज अंजन आँखिन भर।
विश्वरुप हरि को लख पाऊं ॥

गुरु चरनन में ...


भटके नहीं कहीं मन मेरा।
आँख मूंद जब उनको ध्याऊं ।

पीत गुलाबी शिशु से कोमल।
गुरु के चरन कमल लख पाऊं ॥

गुरु चरनन में ध्यान लगाऊं ॥
एक टिप्पणी भेजें