बुधवार, दिसंबर 02, 2009

भजन - छोड़ झमेला झूठे जग का

छोड़ झमेला झूठे जग का
कह गये दास कबीर |
पार लगायेंगे एक पल में
तुलसी के रघुवीर ||

भूल भुलैयाँ जीवन तेरा
साँचो नाम प्रभु को |
मन में बसा ले आज तू बन्दे
लेकर नाम गुरु को |
सूरदास के श्याम हरेंगे
जनम जनम की पीर ||

मेरा मेरा दिन भर करता
पर तेरा कछु नाँहीं |
माटी का ये खेल है सारा
मिलेगा माटी माँहीं |
मीराजी के गीत बुलायें
सबको यमुना तीर ||


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भजन - नैया पड़ी मंझधार

नैया पड़ी मंझधार, गुरु बिन, कैसे लागे पार॥

मैं अपराधी जनम को मन में भरा विकार ।
तुम दाता दुख भंजन मेरी करो सम्हार ।
अवगुन दास कबीर के बहुत गरीबनवाज़ ।
जो मैं पूत, कपूत हूं, तहौं पिता की लाज ॥
गुरु बिन, कैसे लागे पार ॥

साहिब, तुम मत भूलियो, लाख लोग लगि जाँहिं ।
हम से तुमरे बहुत हैं, तुम से हमरे नाहिं ।
अंतरयामी एक तुम, आतम के आधार ।
जो तुम छोड़ो हाथ, प्रभुजी, कौन उतारे पार ॥
गुरु बिन, कैसे लागे पार ॥


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मंगलवार, दिसंबर 01, 2009

भजन - बिगड़ी बात बना दे राम

बिगड़ी बात बना दे राम
नैया पार लगा दे राम |
युग युग से मैं भटक रहा
अब तो राह दिखा दे राम ||

राम हे राम, राम सिया राम

घोर अंधेरा छाया है
मन पंछी घबराया है |
मोह माया के चक्कर में
ये मूरख भरमाया है |
अब तो अंधेरा दूर करो
ज्ञान का दीप जला दे राम ||

तुमने जीवनदान दिया
कितना बड़ा एहसान किया |
हमने मगर इस जीवन का
पग पग पर अपमान किया |
जैसे हैं हम तेरे हैं
भले बुरे प्रभु तेरे हैं
गुण अवगुण बिसरा दे राम ||

बिगड़ी बात बना दे राम

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भजन - तूने रात गँवायी सोय के

तूने रात गँवायी सोय के दिवस गँवाया खाय के।
हीरा जनम अमोल था कौड़ी बदले जाय॥

सुमिरन लगन लगाय के मुख से कछु ना बोल रे।
बाहर के पट बंद कर ले अंतर के पट खोल रे।
माला फेरत जुग हुआ गया ना मन का फेर रे।
गया ना मन का फेर रे।
हाथ का मनका छोड़ दे मन का मनका फेर॥

दुख में सुमिरन सब करें सुख में करे न कोय रे।
जो सुख में सुमिरन करे तो दुख काहे को होय रे।
सुख में सुमिरन ना किया दुख में करता याद रे।
दुख में करता याद रे।
कहे कबीर उस दास की कौन सुने फ़रियाद॥

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भजन - सुर की गति मैं

सुर की गति मैं क्या जानूँ .
एक भजन करना जानूँ ..

अर्थ भजन का भी अति गहरा
उस को भी मैं क्या जानूँ ..
प्रभु प्रभु प्रभु कहना जानूँ
नैना जल भरना जानूँ ..

गुण गाये प्रभु न्याय न छोड़े
फिर तुम क्यों गुण गाते हो
मैं बोला मैं प्रेम दीवाना
इतनी बातें क्या जानूँ ..

प्रभु प्रभु प्रभु कहना जानूँ
नैना जल भरना जानूँ ..

फुल्वारी के फूल फूल के
किस्के गुन नित गाते हैं .
जब पूछा क्या कुछ पाते हो
बोल उठे मैं क्या जानूँ ..

प्रभु प्रभु प्रभु कहना जानूँ
नैना जल भरना जानूँ ..

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भजन: दर्शन दो घनश्याम नाथ



दर्शन दो घनश्याम नाथ मोरी अँखियाँ प्यासी रे ..

मंदिर मंदिर मूरत तेरी फिर भी न दीखे सूरत तेरी .
युग बीते ना आई मिलन की पूरनमासी रे ..
दर्शन दो घनश्याम नाथ मोरि अँखियाँ प्यासी रे ..

द्वार दया का जब तू खोले पंचम सुर में गूंगा बोले .
अंधा देखे लंगड़ा चल कर पँहुचे काशी रे ..
दर्शन दो घनश्याम नाथ मोरि अँखियाँ प्यासी रे ..

पानी पी कर प्यास बुझाऊँ नैनन को कैसे समजाऊँ .
आँख मिचौली छोड़ो अब तो घट घट वासी रे ..
दर्शन दो घनश्याम नाथ मोरि अँखियाँ प्यासी रे ..

बुधवार, नवंबर 11, 2009

भजन - राधा रास बिहारी मोरे मन में आन समाये

Radha Raas Bihari - MP3 Audio
By Preeti Chandra

राधा रास बिहारी
मोरे मन में आन समाये ।

निर्गुणियों के साँवरिया ने
खोये भाग जगाये ।

मैं नाहिं जानूँ आरती पूजा
केवल नाम पुकारूं ।

साँवरिया बिन हिरदय दूजो
और न कोई धारूँ ।

चुपके से मन्दिर में जाके
जैसे दीप जलाये ॥

राधा रास बिहारी
मोरे मन में आन समाये ।

दुःखों में था डूबा जीवन
सारे सहारे टूटे ।

मोह माया ने डाले बन्धन
अन्दर बाहर छूटे ॥

कैसी मुश्किल में हरि मेरे
मुझको बचाने आये ।

राधा रास बिहारी मोरे
मन में आन समाये ॥

दुनिया से क्या लेना मुझको
मेरे श्याम मुरारी ॥

मेरा मुझमें कुछ भी नाहिं
सर्वस्व है गिरिधारी ।

शरन लगा के हरि ने मेरे
सारे दुःख मिटाये ॥

राधा रास बिहारी मोरे
मन में आन समाये ॥

मंगलवार, नवंबर 10, 2009

भजन - दीनबन्धु दीनानाथ, मेरी तन हेरिये

Dinabandhu Dinanath - MP3 Audio
By Shri V N Shrivastav 'Bhola'

दीनबन्धु दीनानाथ, मेरी तन हेरिये ॥

भाई नाहिं, बन्धु नाहिं, कटुम-परिवार नाहिं ।
ऐसा कोई मीत नाहिं, जाके ढिंग जाइये ॥

खेती नाहिं, बारी नाहिं, बनिज ब्योपार नाहिं
ऐसो कोउ साहु नाहिं जासों कछू माँगिये ॥

कहत मलूकदास छोड़ि दे पराई आस,
रामधनी पाइकै अब काकी सरन जाइये ॥

रविवार, नवंबर 08, 2009

भजन - प्रभु तेरो नाम

Prabhu Tero Naam - MP3 Audio
By Lata Mangeshkar for the Film 'Hum Dono'

प्रभु तेरो नाम
जो ध्याये फल पाये,
सुख लाये तेरो नाम
प्रभु तेरो नाम
जो ध्याये फल पाये,
सुख लाये तेरो नाम

तेरी दया हो जाये तो दाता
तेरी दया हो जाये तो दाता
जीवन धन मिल जाये, मिल जाये
मिल जाये, सुख लाये तेरो नाम
जो ध्याये फल पाये,
सुख दायी तेरो नाम

तू दानी तू अन्तरयामी
तू दानी
तू दानी तू अन्तरयामी
तेरी कृपा हो जाये तो स्वामी
हर बिगड़ी बन जाये
जीवन धन मिल जाये, मिल जाये
मिल जाये, सुख लाये तेरो नाम
जो ध्याये फल पाये,
सुख लाये तेरो नाम

बस जाये मोरा सूना अंगना
बस जाये
बस जाये मोरा सूना अंगना
खिल जाये मुरझाया सपना
जीवन में रस आये
जीवन धन मिल जाये, मिल जाये
मिल जाये, सुख लाये तेरो नाम

जो ध्याये फल पाये, सुख लाये तेरो नाम
जो ध्याये फल पाये, सुख लाये तेरो नाम

बुधवार, नवंबर 04, 2009

भजन - रे मन हरि सुमिरन करि लीजै

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रे मन हरि सुमिरन करि लीजै ॥

हरिको नाम प्रेमसों जपिये, हरिरस रसना पीजै ।
हरिगुन गाइय, सुनिय निरंतर, हरि-चरननि चित दीजै ॥

हरि-भगतनकी सरन ग्रहन करि, हरिसँग प्रीति करीजै ।
हरि-सम हरि जन समुझि मनहिं मन तिनकौ सेवन कीजै ॥

हरि केहि बिधिसों हमसों रीझै, सो ही प्रश्न करीजै ।
हरि-जन हरिमारग पहिचानै, अनुमति देहिं सो कीजै ॥

हरिहित खाइय, पहिरिय हरिहित, हरिहित करम करीजै ।
हरि-हित हरि-सन सब जग सेइय, हरिहित मरिये जीजै ॥

शुक्रवार, अक्तूबर 23, 2009

मानस से - प्रात पुनीत काल प्रभु जागे

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प्रात पुनीत काल प्रभु जागे ।
अरुनचूड़ बर बोलन लागे ॥

प्रात काल उठि कै रघुनाथा ।
मात पिता गुरु नावइँ माथा ॥

मात पिता गुरु प्रभु कै बानी ।
बिनहिं बिचार करिय सुभ जानी ॥

सुनु जननी सोइ सुत बड़भागी ।
जो पितु मात बचन अनुरागी ॥

धरम न दूसर सत्य समाना ।
आगम निगम पुराण बखाना ।।

परम धर्म श्रुति बिदित अहिंसा ।
पर निंदा सम अघ न गरीसा ॥

पर हित सरिस धरम नहि भाई ।
पर पीड़ा सम नहिं अधमाई ॥

पर हित बस जिन के मन माँहीं ।
तिन कहुँ जग दुर्लभ कछु नाहीँ ॥

गिरिजा संत समागम, सम न लाभ कछु आन ।
बिनु हरि कृपा न होइ सो, गावहिं वेद पुराण ॥

भजन - भज मन राम चरण सुखदाई ..

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भज मन राम चरण सुखदाई ..

जिन चरनन से निकलीं सुरसरि
शंकर जटा समायी .
जटा शन्करी नाम पड़्यो है
त्रिभुवन तारन आयी ..
राम चरण सुखदाई ..

शिव सनकादिक अरु ब्रह्मादिक
शेष सहस मुख गायी .
तुलसीदास मारुतसुत की प्रभु
निज मुख करत बड़ाई ..
राम चरण सुखदाई ..


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मानस से - पाई न केहिं गति

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पाई न केहिं गति पतित पावन राम भजि सुनु सठ मना।
गनिका अजामिल ब्याध गीध गजादि खल तारे घना।।

आभीर जमन किरात खस स्वपचादि अति अघरूप जे।
कहि नाम बारक तेपि पावन होहिं राम नमामि ते।।1।।

रघुबंस भूषन चरित यह नर कहहिं सुनहिं जे गावहीं।
कलि मल मनोमल धोइ बिनु श्रम राम धाम सिधावहीं।।

सत पंच चौपाईं मनोहर जानि जो नर उर धरै।
दारुन अबिद्या पंच जनित बिकार श्रीरघुबर हरै।।2।।

सुंदर सुजान कृपा निधान अनाथ पर कर प्रीति जो।
सो एक राम अकाम हित निर्बानप्रद सम आन को।।

जाकी कृपा लवलेस ते मतिमंद तुलसीदासहूँ।
पायो परम बिश्रामु राम समान प्रभु नाहीं कहूँ।।3।।

भजन - जानकी नाथ सहाय करें जब ..

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जानकी नाथ सहाय करें जब कौन बिगाड़ करे नर तेरो ..

सुरज मंगल सोम भृगु सुत बुध और गुरु वरदायक तेरो .
राहु केतु की नाहिं गम्यता संग शनीचर होत हुचेरो ..

दुष्ट दु:शासन विमल द्रौपदी चीर उतार कुमंतर प्रेरो .
ताकी सहाय करी करुणानिधि बढ़ गये चीर के भार घनेरो ..

जाकी सहाय करी करुणानिधि ताके जगत में भाग बढ़े रो .
रघुवंशी संतन सुखदायी तुलसीदास चरनन को चेरो ..

शनिवार, अक्तूबर 10, 2009

मानस से - नवधा भक्ति

MP3 Audio (Kavita Krishnamurty)

प्रथम भगति संतन कर संगा |
दूसरि रति मम कथा प्रसंगा ||

गुर पद पंकज सेवा तीसरि भगति अमान |
चौथि भगति मम गुन गन करइ कपट तज गान ||

मंत्र जाप मम दृढ़ बिस्वासा |
पंचम भजन सो बेद प्रकासा ||

छठ दम सील बिरति बहु करमा |
निरत निरंतर सज्जन धर्मा ||

सातव सम मोहि मय जग देखा |
मोते संत अधिक करि लेखा ||

आठव जथा लाभ संतोषा |
सपनेहु नहिं देखहि परदोषा ||

नवम सरल सब सन छनहीना |
मम भरोस हिय हरष न दीना ||

नव महुं एकउ जिन्ह कें होई ।
नारि पुरूष सचराचर कोई ॥

मम दरसन फल परम अनूपा |
जीव पाइ निज सहज सरूपा ||

सगुन उपासक परहित निरत नीति दृढ़ नेम |
ते नर प्राण समान मम जिन के द्विज पद प्रेम ||

गुरुवार, सितंबर 24, 2009

आरती - ॐ जय जगदीश हरे

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ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे .
भक्त जनों के संकट, क्षण में दूर करे ..

जो ध्यावे फल पावे, दुख बिनसे मन का .
सुख सम्पति घर आवे, कष्ट मिटे तन का ..

मात पिता तुम मेरे, शरण गहूं मैं किसकी .
तुम बिन और न दूजा, आस करूं मैं जिसकी ..

तुम पूरण परमात्मा, तुम अंतरयामी .
पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सब के स्वामी ..

तुम करुणा के सागर, तुम पालनकर्ता .
मैं सेवक तुम स्वामी, कृपा करो भर्ता ..

तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति .
किस विधि मिलूं दयामय, तुमको मैं कुमति ..

दीनबंधु दुखहर्ता, तुम रक्षक मेरे .
करुणा हस्त बढ़ाओ, द्वार पड़ा तेरे ..

विषय विकार मिटाओ, पाप हरो देवा .
श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ, संतन की सेवा ..


http://www.bhajans.org/aaratii/OMjayajagadiishhare.mp3

आरती कुँज बिहारी की

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आरती कुँज बिहारी की
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ..

गले में वैजन्ती माला, माला
बजावे मुरली मधुर बाला, बाला
श्रवण में कुण्डल झलकाला, झलकाला
नन्द के नन्द,
श्री आनन्द कन्द,
मोहन बॄज चन्द
राधिका रमण बिहारी की
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ..

गगन सम अंग कान्ति काली, काली
राधिका चमक रही आली, आली
लसन में ठाड़े वनमाली, वनमाली
भ्रमर सी अलक,
कस्तूरी तिलक,
चन्द्र सी झलक
ललित छवि श्यामा प्यारी की
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ..

जहाँ से प्रगट भयी गंगा, गंगा
कलुष कलि हारिणि श्री गंगा, गंगा
स्मरण से होत मोह भंगा, भंगा
बसी शिव शीश,
जटा के बीच,
हरे अघ कीच
चरण छवि श्री बनवारी की
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ..

कनकमय मोर मुकुट बिलसै, बिलसै
देवता दरसन को तरसै, तरसै
गगन सों सुमन राशि बरसै, बरसै
अजेमुरचन
मधुर मृदंग
मालिनि संग
अतुल रति गोप कुमारी की
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ..

चमकती उज्ज्वल तट रेणु, रेणु
बज रही बृन्दावन वेणु, वेणु
चहुँ दिसि गोपि काल धेनु, धेनु
कसक मृद मंग,
चाँदनि चन्द,
खटक भव भन्ज
टेर सुन दीन भिखारी की
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ..

http://www.bhajans.org/aaratii/kunjabihaarii.mp3

आरती हनुमानजी की

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आरति कीजै हनुमान लला की

आरति कीजै हनुमान लला की .
दुष्ट दलन रघुनाथ कला की ..

जाके बल से गिरिवर काँपे
रोग दोष जाके निकट न झाँके .
अंजनि पुत्र महा बलदायी
संतन के प्रभु सदा सहायी ..
आरति कीजै हनुमान लला की .

दे बीड़ा रघुनाथ पठाये
लंका जाय सिया सुधि लाये .
लंका सौ कोटि समुद्र सी खाई
जात पवनसुत बार न लाई ..
आरति कीजै हनुमान लला की .

लंका जारि असुर संघारे
सिया रामजी के काज संवारे .
लक्ष्मण मूर्छित पड़े सकारे
आन संजीवन प्राण उबारे ..
आरति कीजै हनुमान लला की .

पैठि पाताल तोड़ि यम कारे
अहिरावन की भुजा उखारे .
बाँये भुजा असुरदल मारे
दाहिने भुजा संत जन तारे ..
आरति कीजै हनुमान लला की .

सुर नर मुनि जन आरति उतारे
जय जय जय हनुमान उचारे .
कंचन थार कपूर लौ छाई
आरती करति अंजना माई ..
आरति कीजै हनुमान लला की .

जो हनुमान जी की आरति गावे
बसि वैकुण्ठ परम पद पावे .
आरति कीजै हनुमान लला की .
दुष्ट दलन रघुनाथ कला की ..


http://www.bhajans.org/aaratii/hanumaan.mp3

आरती श्री रामायणजी की

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आरती श्री रामायणजी की .
कीरति कलित ललित सिय पी की ..

गावत ब्रह्मादिक मुनि नारद .
बालमीक बिग्यान बिसारद ..
सुक सनकादि सेष और सारद .
बरन पवन्सुत कीरति नीकी ..

गावत बेद पुरान अष्टदस .
छओं सास्त्र सब ग्रंथन को रस ..
मुनि जन धन संतन को सरबस .
सार अंस सम्म्मत सब ही की ..

गावत संतत संभु भवानी .
अरु घटसंभव मुनि बिग्यानी ..
ब्यास आदि कबिबर्ज बखानी .
कागभुसुंडि गरुड के ही की ..

कलि मल हरनि बिषय रस फीकी .
सुभग सिंगार मुक्ति जुबती की ..
दलन रोग भव भूरि अमी की .
तात मात सब बिधि तुलसी की ..


http://www.bhajans.org/aaratii/raamaayaNa.mp3

आरती - जय जगदीश हरे

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जय जगदीश हरे प्रभु ! जय जगदीश हरे !
मायातीत, महेश्वर, मन-बच-बुद्धि परे ॥टेक॥

आदि, अनादि, अगोचर, अविचल, अविनाशी ।
अतुल, अनंत, अनामय, अमित शक्ति-राशी ॥१॥ जय०

अमल, अकल, अज, अक्षय, अव्यय, अविकारी ।
सत-चित-सुखमय, सुंदर, शिव, सत्ताधारी ॥२॥ जय०

विधि, हरि, शंकर, गणपति, सूर्य, शक्तिरूपा ।
विश्व-चराचर तुमही, तुमही जग भूपा ॥३॥ जय०

माता-पिता-पितामह-स्वामिसुह्रद भर्ता ।
विश्वोत्पादक-पालक-रक्षक-संहर्ता ॥४॥ जय०

साक्षी, शरण, सखा, प्रिय, प्रियतम, पूर्ण प्रभो ।
केवल काल कलानिधि, कालातीत विभो ॥५॥ जय०

राम कृष्ण, करुणामय, प्रेमामृत-सागर ।
मनमोहन, मुरलीधर, नित-नव नटनागर ॥६॥ जय०

सब विधिहीन, मलिनमति, हम अति पातकि जन ।
प्रभु-पद-विमुख अभागी कलि-कलुषित-तन-मन ॥७॥ जय०

आश्रय-दान दयार्णव ! हम सबको दीजे ।
पाप-ताप हर हरि ! सब, निज-जन कर लीजे ॥८॥ जय०

आरती - हर हर हर महादेव

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हर हर हर महादेव !

सत्य, सनातन, सुंदर, शिव ! सबके स्वामी ।
अविकारी, अविनाशी, अज, अंतर्यामी ॥१॥ हर हर०

आदि अनंत, अनामय, अकल, कलाधारी ।
अमल, अरूप, अगोचर, अविचल अघहारी ॥२॥ हर हर०

ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर, तुम त्रिमूर्तिधारी ।
कर्ता, भर्ता, धर्ता तुम ही संहारी ॥३॥ हर हर०

रक्षक, भक्षक, प्रेरक, तुम औढरदानी ।
साक्षी, परम अकर्ता कर्ता अभिमानी ॥४॥ हर हर०

मणिमय भवन निवासी, अति भोगी, रागी ।
सदा मसानबिहारी, योगी वैरागी ॥५॥ हर हर०

छाल, कपाल, गरल, गल, मुंडमाल व्याली ।
चिताभस्म तन, त्रिनयन, अयन महाकाली ॥६॥ हर हर०

प्रेत-पिशाच, सुसेवित पीत जटाधारी ।
विवसन, विकट रूपधर, रुद्र प्रलयकारी ॥७॥ हर हर०

शुभ्र, सौम्य, सुरसरिधर, शशिधर, सुखकारी ।
अतिकमनीय, शान्तिकर शिव मुनि मन हारी ॥८॥ हर हर०

निर्गुण, सगुण, निरंजन, जगमय नित्य प्रभो ।
कालरूप केवल, हर ! कालातीत विभो ॥९॥ हर हर०

सत-चित-आनँद, रसमय, करुणामय, धाता ।
प्रेम-सुधा-निधि, प्रियतम, अखिल विश्व-त्राता ॥१०॥ हर हर०

हम अति दीन, दयामय ! चरण-शरण दीजै ।
सब विधि निर्मल मति कर अपना कर लीजै ॥११॥ हर हर०

शनिवार, सितंबर 19, 2009

कीर्तन - बन्धुगणो ! मिल कहो प्रेमसे (२)

बन्धुगणो ! मिल कहो प्रेमसे - 'रघुपति राघव राजाराम ।'
मुदित चित्तसे घोष करो पुनि - 'पतित पावन सीताराम ॥'

जिह्वा-जीवन सफल करो कह -'जय रघुनन्दन, जय सियाराम ।'
ह्रदय खोल बोलो मत चूको- 'जानकिवल्लभ सीताराम ॥'

गौर रुचिर, नवघनश्याम छबि, 'जय लक्ष्मण, जय जय श्रीराम ।'
अनुगत परम अनुज रघुबरके- 'भरत-सत्रुहन शोभाधाम ॥'

उभय सखा राघवके प्यारे -'कपिपति, लंकापति अभिराम ।'
परम भक्त निष्कामशिरोमणि 'जय श्रीमारुति पूरणकाम ॥'

अति उमंगसे बोलो संतत - 'रघुपति राघव राजाराम।'
मुक्तकंठ हो सदा पुकारो- 'पतित पावन सीताराम ॥'

http://www.archive.org/download/AratiGeetMala/AGM-bandhu-gano-raghupati-raaghav.mp3

कीर्तन - बन्धुगणो ! मिलि कहो प्रेमसे (१)

बन्धुगणो ! मिलि कहो प्रेमसे 'यदुपति ब्रजपति श्यामा-श्याम ।'
मुदित चित्तसे घोष करो पुनि- 'पतित पावन राधेश्याम ॥'

जिह्वा-जीवन सफल करो कह- 'जय यदुनन्दन, जय घनश्याम ।'
ह्रदय खोल बोलो, मत चूको- 'रुक्मिणिवल्लभ श्याम श्याम ॥'

नव-नीरद-तनु, गौर मनोहर, 'जय श्रीमाधव जय बलराम।'
उभय सखा मोहनके प्यारे -'जय श्रीदामा, जयति सुदाम ॥'

परमभक्त निष्कामशिरोमणि- 'उद्धव-अर्जुन शोभाधाम।'
प्रेम-भक्ति-रस-लीन निरन्तर विदुर, 'विदुर-गृहिणी अभिराम ॥'

अति उमंगसे बोलो सन्तत- 'यदुपति ब्रजपति श्यामा-श्याम ।'
मुक्तकंठसे सदा पुकारो- 'पतित पावन राधेश्याम ॥'

http://www.archive.org/download/AratiGeetMala/AGM-bandhu-gano-jay-raadhe-raadhe.mp3

Antardhwani - PDF

Antardhwani by VNS Bhola