तू ही बन जा मेरा मांझी

तू ही बन जा मेरा माँझी, पार लगा दे मेरी नैया .
हे नटनागर, कृष्ण कन्हैया, पार लगा दे मेरी नैया ..

इस जीवन के सागर में, हर क्षण लगता है डर मुझको .
क्या भला है, क्या बुरा है, तू ही बता दे मुझको .
हे नटनागर, कृष्ण कन्हैया, पार लगा दे मेरी नैया ..
तू ही बन जा ...

क्या तेरा और क्या मेरा है, सब कुछ तो बस सपना है .
इस जीवन के मोहजाल में, सबने सोचा अपना है .
हे नटनागर, कृष्ण कन्हैया, पार लगा दे मेरी नैया ..
तू ही बन जा ...

करुणा भरी पुकार सुन

करुणा भरी पुकार सुन अब तो पधारो मोहना ..

कृष्ण तुम्हारे द्वार पर आया हूँ मैं अति दीन हूँ .
करुणा भरी निगाह से अब तो पधारो मोहना ..

कानन कुण्डल शीश मुकुट गले बैजंती माल हो .
सांवरी सूरत मोहिनी अब तो दिखा दो मोहना ..

पापी हूँ अभागी हूँ दरस का भिखारी हूँ .
भवसागर से पार कर अब तो उबारो मोहना ..

कीर्तन - कन्हैया कन्हैया तुझे आना पड़ेगा,

कन्हैया कन्हैया तुझे आना पड़ेगा,
आना पड़ेगा .
वचन गीता वाला निभाना पड़ेगा ..

गोकुल में आया मथुरा में आ
छवि प्यारी प्यारी कहीं तो दिखा .
अरे सांवरे देख आ के ज़रा
सूनी सूनी पड़ी है तेरी द्वारिका ..

जमुना के पानी में हलचल नहीं .
मधुबन में पहला सा जलथल नहीं .
वही कुंज गलियाँ वही गोपिआँ .
छनकती मगर कोई झान्झर नहीं .

कीर्तन - आओ आओ यशोदा के लाल

आओ आओ यशोदा के लाल .
आज मोहे दरशन से कर दो निहाल .
आओ आओ,
आओ आओ यशोदा के लाल ..

नैया हमारी भंवर मे फंसी .
कब से अड़ी उबारो हरि .
कहते हैं दीनों के तुम हो दयाल .( २)
आओ आओ,
आओ आओ यशोदा के लाल ..

अबतो सुनलो पुकार मेरे जीवन आधार .
भवसागर है अति विशाल .
लाखों को तारा है तुमने गोपाल .( २)
आओ आओ,
आओ आओ यशोदा के लाल ..

यमुना के तट पर गौवें चराकर .
छीन लिया मेरा मन मुरली बजाकर .
हृदय हमारे बसो नन्दलाल . ( २)
आओ आओ,
आओ आओ यशोदा के लाल ..

प्रबल प्रेम के पाले पड़ कर

प्रबल प्रेम के पाले पड़ कर प्रभु को नियम बदलते देखा .
अपना मान भले टल जाये भक्त मान नहीं टलते देखा ..

जिसकी केवल कृपा दृष्टि से सकल विश्व को पलते देखा .
उसको गोकुल में माखन पर सौ सौ बार मचलते देखा ..

जिस्के चरण कमल कमला के करतल से न निकलते देखा .
उसको ब्रज की कुंज गलिन में कंटक पथ पर चलते देखा ..

जिसका ध्यान विरंचि शंभु सनकादिक से न सम्भलते देखा .
उसको ग्वाल सखा मंडल में लेकर गेंद उछलते देखा ..

जिसकी वक्र भृकुटि के डर से सागर सप्त उछलते देखा .
उसको माँ यशोदा के भय से अश्रु बिंदु दृग ढ़लते देखा ..

जय कृष्ण हरे

जय कृष्ण हरे श्री कृष्ण हरे .
दुखियों के दुख दूर करे जय जय जय कृष्ण हरे ..

जब चारों तरफ़ अंधियारा हो आशा का दूर किनारा हो .
जब कोई ना खेवन हारा हो तब तू ही बेड़ा पार करे .
तू ही बेड़ा पार करे जय जय जय कृष्ण हरे ..

तू चाहे तो सब कुछ कर दे विष को भी अमृत कर दे .
पूरण कर दे उसकी आशा जो भी तेरा ध्यान धरे .
जो भी तेरा ध्यान धरे जय जय जय कृष्ण हरे ..

राम से बड़ा राम का नाम ..

Download bhajan by Madhav

राम से बड़ा राम का नाम .
अंत में निकला ये परिणाम, ये परिणाम,
राम से बड़ा राम का नाम ..

सिमरिये नाम रूप बिनु देखे,
कौड़ी लगे ना दाम .
नाम के बांधे खिंचे आयेंगे,
आखिर एक दिन राम .
राम से बड़ा राम का नाम ..

जिस सागर को बिना सेतु के ,
लांघ सके ना राम .
कूद गये हनुमान उसी को,
लेकर राम का नाम .
राम से बड़ा राम का नाम ..

वो दिलवाले डूब जायेंगे or वो दिलवाले क्या पायेंगे ,
जिनमें नहीं है नाम ..
वो पत्थर भी तैरेंगे जिन पर
लिखा हुआ श्री राम.
राम से बड़ा राम का नाम ..



Many Thanks to Anil Dada for corrections.

रघुकुल प्रगटे हैं रघुबीर ..

रघुकुल प्रगटे हैं रघुबीर ..

देस देस से टीको आयो रतन कनक मनि हीर .

घर घर मंगल होत बधाई भै पुरवासिन भीर .

आनंद मगन होइ सब डोलत कछु ना सौध शरीर .

मागध बंदी सबै लुटावैं गौ गयंद हय चीर .

देत असीस सूर चिर जीवौ रामचन्द्र रणधीर .

भजन - ठुमक चलत रामचंद्र

ठुमक चलत रामचंद्र बाजत पैंजनियां ..

किलकि किलकि उठत धाय
गिरत भूमि लटपटाय .
धाय मात गोद लेत
दशरथ की रनियां ..

अंचल रज अंग झारि
विविध भांति सो दुलारि .
तन मन धन वारि वारि
कहत मृदु बचनियां ..

विद्रुम से अरुण अधर
बोलत मुख मधुर मधुर .
सुभग नासिका में चारु
लटकत लटकनियां ..

तुलसीदास अति आनंद
देख के मुखारविंद .
रघुवर छबि के समान
रघुवर छबि बनियां ..


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भजन - श्रीरामचन्द्र कृपालु भजु मन ..

श्रीरामचन्द्र कृपालु भजु मन हरण भवभय दारुणम् .
नवकञ्ज लोचन कञ्ज मुखकर कञ्जपद कञ्जारुणम् .. १..

कंदर्प अगणित अमित छबि नव नील नीरज सुन्दरम् .
पटपीत मानहुं तड़ित रुचि सुचि नौमि जनक सुतावरम् .. २..

भजु दीन बन्धु दिनेश दानव दैत्यवंशनिकन्दनम् .
रघुनन्द आनंदकंद कोशल चन्द दशरथ नन्दनम् .. ३..

सिर मुकुट कुण्डल तिलक चारु उदार अङ्ग विभूषणम् .
आजानुभुज सर चापधर सङ्ग्राम जित खरदूषणम् .. ४..

इति वदति तुलसीदास शङ्कर शेष मुनि मनरञ्जनम् .
मम हृदयकञ्ज निवास कुरु कामादिखलदलमञ्जनम् .. ५..


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