विजय रथ
श्री जस्टिस शिव दयालजी श्रीवास्तव द्वारा रामचरितमानस से चुनी हुई चौपाइयाँ एवं दोहे, जो 'उत्थान पथ' एवं 'साधना पथ' में प्रकाशित किए गए ।
MP3 - माधव मुकुंद और प्रार्थना श्रीवास्तव के स्वरों में
दो.- वचनकर्म मन मोरि गति भजनु करहिं निःकाम ।
तिन्ह के हृदय कमल महुँ करउँ सदा विश्राम ।।
तिन्ह के हृदय कमल महुँ करउँ सदा विश्राम ।।
सुनहु सखा कह कृपानिधाना । जेहिं जय होइ सो स्यंदन आना ।।
सौरज धीरज तेहि रथ चाका । सत्य सील दृढ़ ध्वजा पताका ।।
बल बिबेक दम परहित घोरे । छमा कृपा समता रजु जोरे ।।
ईस भजनु सारथी सुजाना । बिरति चर्म संतोष कृपाना ।।
दान परसु बुधि सक्ति प्रचंडा । बर बिग्यान कठिन कोदंडा ।।
अमल अचल मन त्रोन समाना । सम जम नियम सिलीमुख नाना ।।
कवच अभेद बिप्र गुर पूजा । एहि सम विजय उपाय न दूजा ।।
सखा धर्ममय अस रथ जाकें । जीतन कहँ न कतहुँ रिपु ताकें ।।
दो.- महा अजय संसार रिपु जीति सकइ सो बीर ।
जाकें अस रथ होइ दृढ़ सुनहु सखा मतिधीर ।।
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रणभूमि पर श्रीराम को बिना रथ के विभीषण ने देखा तो उन्हें शंका हुई कि रावण पर विजय कैसे होगी, तो श्रीराम कहते हैं —
हे सखे ! सुनो, जिससे विजय होती है, वह रथ तो दूसरा ही है ।
शौर्य तथा धैर्य उस रथ के पहिये हैं । सत्य और सदाचार उसकी दृढ़ ध्वजा और पताका हैं । बल, विवेक, दमन, (इन्द्रियों का) और परोपकार ये चार उसके घोड़े हैं, जो क्षमा, दया और समतारूपी डोरी से रथ में जोड़े हुए हैं। ईश्वर का भजन ही उसे चलानेवाला कुशल सारथी है। वैराग्य ढाल है, और संतोष तलवार। दान फरसा है, बुद्धि प्रचण्ड शक्ति है, और उत्तम विज्ञान है प्रचंड धनुष। निर्मल और स्थिर मन तरकस के समान है। शम (मन का वश में होना), (अहिंसादि) यम और (शौचादि) नियम ये अनेक बाण हैं। ब्राह्मणों और गुरु का पूजन अभेद्य कवच है। इसके समान विजय का दूसरा कोई उपाय नहीं।
हे सखे! ऐसा कर्ममय रथ जिसके पास हो उसके लिए जीतने को कहीं कोई शत्रु ही नहीं है।
हे धीर बुद्धिवाले सखा! सुनो, जिसके पास ऐसा दृढ़ रथ हो, वह वीर संसार (जन्म-मृत्यु) रूपी महान् शत्रु को भी जीत सकता है।
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